जरूर पढ़े : कछुए और खरगोश की आगे की कहानी

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जरूर पढ़े : कछुए और खरगोश की आगे की कहानी

कछुए और खरगोश की दौड़ मे..आलसी खरगोश कुछ दूर जाकर सो जाता है और मेहनती कछुआ जीत जाता है..कहानी खत्म हो जाती है !
लेकिन इस कहानी मे भयंकर twist है आगे पढे, फिर क्या होता है ??

ये जानने के लिए आप इस आलेख को विस्तार से पढिए ।

सामर्थवान मनुष्य जब किसी दुर्बल से हारता है तो उसका दंभ (ego) टूट जाता है और वह कुंठीत हो जाता है ।

ठीक वैसे ही चमत्कारिक तरीके से मिली जीत हमे अतिउत्साही…….. (overconfident) बना देती है ये सब naturally है ….जिसे हम अपने सकारात्मक या नकारात्मक विचारो से खुद मे स्थापित कर लेते है।

चूंकि …खरगोश एक तेज दौड़ने वाला प्राणी होता है;…फिर कछुए की तुलना मे तो कई गुना अधिक सामर्थवान !
लेकिन हार चुका था ,……कुंठित हो गया !

खरगोश दोबारा प्रतियोगिता चाहता था सो कछुए से बोला
— एक बार फिर से शर्त लगाता हूं… क्या तुम फिर से तैयार हो इस चुनौती के लिए ?

अप्रत्याशित जीत से कछुआ भी अतिउत्साही था ….जीत के नशे मे चूर कछुए ने हामी भर दी !

दौड़ शुरू हुई ,..इस बार खरगोश ने कोई गलती नही किया वह पूरी ताकत से दौड़ा और जीत गया !
लेकिन अतिउत्साह के कारण कछुआ अपना सम्मान गवां चुका था  जिसे वह फिर पाना चाहता था ।

कछुए ने हार नही मानी और चालाकी के साथ पुनः दौड़ के लिए खरगोश से कहा तो ….खरगोश गर्व बोला
-“तुम मुझसे अब कभी नही जीत सकते…. मै वह गलती दोबारा नही दोहराऊंगा और मै हर बार तुमसे प्रतियोगिता के लिए तैयार हूं ।”

कछुए ने दूसरे मार्ग से प्रतियोगिता की शर्त रखी…..अहंकार मे खरगोश ने विवेक खो दिया और शर्त स्वीकार कर लिया !

तीसरी बार दौड़ प्रारंभ हुई खरगोश आगे था लेकिन रास्ते मे नदी आ गई, खरगोश तैरना नही जानता था वह किनारे पर कसमसाकर रह गया !
चालाक कछुआ धीरे-धीरे आया और नदी पार कर गया और वह खुद को उस सम्मान के लिए पुनर्स्थापित कर चुका था ।

इस पूरी घटना को पेड़ पर बैठा एक चील देख रहा था उसने दोनो को समझाता-
” तुम दोनो यूनिक हो ,….ईश्वर ने सबको अलग गुण दिए है उसका उपयोग सही दिशा मे करो दोनो मित्र बनो ,आपातकाल मे आवश्यकता होगी!

लेकिन दोनो न माने और चले गए…..

एक समय जंगल मे आग लग गई सभी जानवर भागने लगे …..
कछुआ नदी से बहुत दूर था चाहकर भी बहुत जल्दी पानी तक नही जा सकता था,….आग बढ़ती जा रही थी।
वही खरगोश की सीमाएं भी नदी के किनारे तक ही सीमीत थी।

तभी आकाश मे उड़ते चील ने उन्हे कहा कहा -“…अब वक्त आ चुका है, …..एकदूसरे की मदद से इस आग का सामना करो।

तब खरगोश जो की तेज दौड़ सकता था ,…….उसने कछुए को अपनी पीठ पर बैठाकर आग को उन तक पहुंचने से …..पहले नदी के किनारे तक ले आया।

अब बारी कछुए की थी
….. नदी मे पहुंचकर कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ पर बैठाकर पार कराया …..और अब दोनो आग से सुरक्षित थे।

हमे भी अपनी दंभी मानसिकता…..कुंठाओ से बाहर निकलना होगा ,विवेक रखना होगा, सबको समान दृष्टि से देखना होगा ,….।
ईश्वर ने सभी को अलग अलग प्रतिभाएं दी है….. सभी दूनिया मे यूनिक है सभी गुण अलग है।
हमे इस वक्र मानसिकता से बाहर निकलकर  एक टीम भावना के साथ आपादा का सामना करना चाहिए…….
अपने लोगो मे छिपी प्रतिभाओ को बाहर निकाले ।
जब हम ऐसा कर सके…… ,तो  हमारी बार जीत होगी ।
पूरे सम्मान के साथ।
गरिमा के साथ।

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